मंगलवार, 25 अगस्त 2015

संथारा आत्महत्या नहीं: डॉ. वेदप्रताप वैदिक

नया इंडिया. 25 अगस्त 2015. डॉवेदप्रताप वैदिक

राजस्थान उच्च न्यायालय ने बर्र के छत्ते में हाथ डाल दिया है। उसने अपने फैसले में कह दिया है कि संथारा /सल्लेखना तथा आत्महत्या मेंकोई फर्क नहीं है। संथारा / सल्लेखना जैन-धर्म की ऐसी प्रथा हैजिसके अंतर्गत जैन लोग अनशन करके अपना जीवन-त्याग देते हैं। इसेसमाधि-मरण भी कहा जाता है। अब यदि यह फैसला लागू हो गया तो संथारा करनेवाले हर जैन को वही सजा भुगतनी होगीजो आत्महत्याकरनेवाले को भुगतनी होती है। अदालत के इस फैसले का विरोध करने के लिए अलग-अलग शहरों में हजारों जैन सड़कों पर उतर आए हैं।

यदि अदालत ने यह फैसला उन लोगों को ध्यान में रखकर किया हैजिन्हें जबर्दस्ती या सामाजिक दबाव में संथारा के लिए बाध्य कियाजाता है तो माना जाएगा कि इस फैसले के पीछे मूल भाव करुणा का है या जीवन के अधिकार का है लेकिन ऐसा एक भी उदाहरण आज तकसुनने या देखने में नहीं आया है। बल्कि इसके विपरीत भारत का जैन समाज सारी दुनिया में इस दृष्टि से बेजोड़ है कि उसके बच्चों को बचपन से ही उपवासों के जरिए आत्म-संयम का पाठ पढ़ाया जाता है। पर्यूषण के दिनों में साल में एक बार तो हर जैन उपवास रखता ही है लेकिन अन्य अवसरों पर जैन लोग एक-एक माह तक खाना  तो दूर रहापानी भी नहीं पीते।

इस प्रक्रिया के चरमोत्कर्ष का नाम ही संथाराहै। स्वेच्छा और प्रसन्नता से देहत्याग करने को आत्महत्या कहना बिल्कुल अनुचित है। आत्महत्या क्यों की जाती हैअपराध-बोध,अपमान-बोध और अवसाद-बोध के कारणक्रोधनिराशाहताशा के कारणक्या संथारा के भी कारण यही होते हैंनहीं। संथारा करनेवालाउत्साहसम्मानपुण्य-भावसमर्पण और त्याग से परिपूर्ण होता है।

यदि संथारा आत्महत्या है तो आमरण अनशन क्या हैगांधीविनोबा,करपात्रीजी और कई शंकराचार्यों को आत्महत्या के लिए गिरफ्तार क्यों नहीं किया गयाअदालत का यह कहना कि संथारा या समाधि-मरण 
जैन-धर्म का मूल सिद्धांत नहीं हैअजीब-सा है। यह कौन तय करेगाजैनाचार्य करेंगेया अंग्रेजी कानून के अंधानुयायी जज लोगमूल सिद्धांत अहिंसा है और संथारा तो उसको व्यवहार में लागू करना है। मृत्यु-जैसी सबसेकष्टदायक घटना को सुखदायक बनाने से 
बड़ी अहिंसा क्या हो सकती है?
देह-त्याग की यह अद्भुत भारतीय परंपरा भगवान राममहावीरऔर भीष्म पितामह के ज़माने से चली  रही 
है। अपने चित्त को देहाभिमान से मुक्त करना तो सदेह मोक्ष ही है। सदेह मोक्ष की इस साधनाको खंडित करना किसीभी कानून के बूते की बात नहीं है।



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